सोमवार, 14 सितंबर 2009

वो रात


वो रात यूँ गुजरी की,कुछ पता न चला,
क्यों दो दिलो के बीच,आ गया था फासला ।
तन्हाइयों ने मुझे ,इस कदर घेर लिया था ,
भीड़ में भी ये मन ,अकेला था हो चला ।
न चाहत थी शोहरत की , न जन्नत माँगी थी,
माँग कर अपनी मोहब्बत ,किया था कौन सा गिला ।
सुनता है तू सबकी ,क्यों मेरी न सुनी तुने ,
क्यों जिंदगी की राहों में,हमसफ़र न मिला ।
अब न खुदा से,मैं कुछ और मांगता हूँ ,
सलामत रहे उसका प्यार ,ये दुआ मांगता हूँ ।
हो सके तो एक रहम ,मुझ पे भी कर देना ,
अगले जनम में उसे ही मेरा ,हमनवां कर देना ।

-मेरे मित्र 'अरुल कुमार श्रीवास्तव' द्वारा प्रेषित ।

1 टिप्पणियाँ:

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति संवेदनशील हृदयस्पर्शी मन के भावों को बहुत गहराई से लिखा है

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