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चित्र : सिर्फ सांकेतिक,गूगल से साभार। |
ये जो मैं हूँ,
क्या ये मैं ही हूँ ?
नहीं अब मैं बचा ही कहाँ हूँ ,
अब तो तुम भी हो !
तुमसे इतर,
मैं था भी तो क्या था ?
जो तुम हो,
तो मैं हूँ !
तुम्हारे होने से ,
मेरा होना है ,
तुम्हारे न होने से,
मेरा होना भी क्या है!
सुनो,
ये जो मैं हूँ ,
तुुम्हारा ही,
प्रतिबिम्ब हूँ!
जो तुम हो ,
वही मैं हूँ,
जो तुमसे अलग हूँ ,
कुछ भी तो नहीं हूँ!
बड़े दिनों बाद कुछ लिखने का मन हुआ, जो बन पड़ा वो यही है। अच्छा बुरा जो भी हो तुम्हारा ही है।
# रोहित / १४. ०३. २०१४
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