रविवार, 16 फ़रवरी 2014

तुम्हारा गढ़ा जाना ..

चित्र: गूगल से साभार 












किसी का किसी के लिए खास बन जाना ,
कुछ तो रही होगी बात ,
युँ ही नहीं होता मुहब्बत के पैमाने का भर जाना। 

कहीं कोई लिख रहा है ,
कुछ कच्चे कुछ पक्के शब्दों के सहारे , 
यादों की कूची में भिगो 
तुम्हारे प्रेम के अहसास सारे !

जितनी की मासूम तुम हो ,
उतने ही मासूम हैं इन शब्दों की कहानी भी ,
जैसे गढ़ती हैं तुम्हारी नाजुक उंगलिया, परियां ,
आज वैसे ही गढ़ रहा है वो तुम्हें भी !

(प्रेम को समझना भी चाहे कोई तो कैसे ........... )
 --------- रोहित /16.02.2014 

शुक्रवार, 15 जून 2012

लौटना तुम्हारा ??


शब्द  जो  मेरे  ह्रदय  के  परतों में  बसते  है,
उन्हें  मैंने  स्वतंत्र  है  किये  ;
वही  शब्द  व्योम  में  प्रतिध्वनित  होते  है ,
अनंत  तक  दुरी  तय  कर  मेरे  पास  ही  लौट  है  आते  ..

सिर्फ  शब्द  ही नहीं ,
शब्दों  के  साथ  एक  तस्वीर  भी  बसती है  मेरे  ह्रदय  में ;
जो  तुम्हारी  है ,
शब्दों  के  माफिक  तुम्हे  भी  बहुत  चाहा है  मैंने ..

जाने  क्यों  ऐसा  लगा ...तुम  तड़प  सी  रही  हो वहाँ  ,
फिर  कब  तक  कैद  करता  तुम्हे  ;
शब्दों  के  सहारे  मैंने  तुम्हे आजाद  कर दिया ,
जाओ   प्रिये  तुम  भी  स्वतंत्र  हो  मेरे  शब्दों  जैसे ..

असल  प्रेम  में  भी  तो  आजाद  होना  है ,
शब्द  आजाद  है  मेरे ...अब  अपने  नहीं  रहे ;
बावजूद  इसके  वे  मेरे  पास  है  आते  ,
मेरे  खालीपन  के  पूरक  है  बन  जाते ..

लो  तुम  भी  आजाद  हो ..अब  अपनी  नहीं  रही ,
जैसे  शब्द  अनंत  से  प्रतिधवनित  हो -
मुझे  तलाशते ,
मेरे  पास  ही  है  लौट  आते ..
आज  तुम्हे  याद  करते  हुए ,
सोच  रहा  हूँ  ;
क्या  तुम  भी  लौटोगी -
मेरे  सूनेपन  में  मेरा   अपना  सिर्फ  मेरा होके ...??

-----------ज्यादा क्या लिखू समझना बस...
रोहित /२३.०४.२०१२

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बुधवार, 7 मार्च 2012

कौन तुम?

कौन तुम?
मेरे मौन की अभिव्यक्ति,
मेरी सहज प्रकृति!!


कौन तुम?
मेरे चित्त की आवृति,
मेरे जीवन की आत्म-स्वीकृति!!


कौन तुम?
मेरी अवचेतन मनोवृति,
मेरे चेतना की काव्य-कृति!


कौन तुम?
मेरे निज की प्रेरणा शक्ति,
मेरे अंतस की आत्म-अनुभूति!!


कौन तुम?
मेरे ह्रदय की ब्रह्म-बाती,
मेरे जीवन की अखंड दीप-ज्योति!!


 कौन तुम?
मेरे प्रेम-धारणा की आसक्ति ,
मेरे बुद्धत्व की अनासक्ति!!


कौन तुम?
मेरे अंतर्मन की लौकिक प्रीति,
मेरे रक्त-कण से प्रस्फुटित अलौकिक प्रेम की परिणिती!!


कौन तुम?
प्रकृति प्रदत्त मेरी आत्मज शक्ति,
या अनुरुक्ति की धरा पर अवतरित परा -शक्ति!! 

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" कौन तुम......इतना कुछ जानने के बाद,समझने के बाद भी मेरे लिए रहस्य बनी हो..तुम कही मेरे ह्रदय में रची-बसी हो ,मैं तुमसे कभी विरत न रहा...बावजूद इसके जो रहस्य का आवरण तुम्हारे ऊपर है..मेरे समझ से परे है..मैं इसी गुत्थी को सुलझाने की कोशिश में जुटा हूँ..तब शायद तुम भी मुझे अपने करीब पाओगी ....इसी उम्मीद में..."---रोहित ..

 

रविवार, 19 जून 2011

पिता !!!


तब उंगलिया थाम ,
कभी चलते थे साथ आप पिता,
जब मैं चलना सिख रहा था,
डग दो डग भरते जो कभी कदम मेरे लड़खड़ाते थे,
दौड़ आप मुझे गले लगाते थे पिता!

मुझे बोलना नहीं आता था पिता,
लोगो ने कहा था माँ से तब,
गूँगा होगा तेरा बेटा,
तब जो शब्द निकले थे मेरे मुख से-
पा.....पा.....पा...पापा,
उस रोज रोई बहुत थी माँ,पिता!

तब बच्चे थे ,
जब सोने वक़्त मेरे और छोटु के जिद पर,
रंगा-सियार की कहानी सुनाते थे पिता ,
क्या बताये हम-
वे कहानिया जेहन में हमारे,
अब भी शास्वत है पिता!

डर लगता था तब,
जब कभी बिजलीया आसमाँ में चमकती थी,
तब अपने सीने से चिपटा-
सुलाते थे आप पिता,
तब कितने सुकून से हम,
सोया करते थे पिता!

दसवीं के इम्तिहान थे तब,
जब मेरे पेपर्स ख़राब हुए थे,
रोया कितना था मैं पिता,
याद है,
गले लगा तब कहा था आपने पिता-
मैं हूँ न बेटा!

चार साल पहले ,
जब मुझे बनारस छोड़ने आये थे पिता,
मैंने देखा था,
आँसू थे आपके आँखों में पिता,
कर्ज कभी उनका-
जो चुकता कर पाऊ मैं,
सोचना बेमानी है पिता!

चाहे अभाव में ,
कटती हो जिंदगी आपकी,
महसूस कभी होने न दिया आपने पिता,
दर्द हमारे हिस्से का भी,
नीलकंठ की भाति पिया आपने,
उसे मैं ही कैसे ,
भूल जाऊं पिता!

दिन कोई ख़ास क्या बताऊ,
स्नेहिल प्रेम शास्वत जो मुझ पे,
हर रोज आपका बरसता है-
उसका शब्दों से,
उदगार कैसे जताऊ पिता..
आज आप दूर हो मुझसे,
आप याद आते हो बहुत पिता!

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चाहे फादर्स डे हो या मदर्स डे...ऐसे में इन दिनों का कोई ख़ास मतलब नही रह जाता-
जबकि माँ और पिता जी का प्यार उनके बच्चों पर रोज ही बरसता है................
रोहित/१९.०६.२०११ /०८:५१ सायं

मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

गरीब का सवाल!!


जा पेट,पीठ से चिपकी है,
महीने बीते,फटी चादर देह से लिपटी है.
यह देख,कहते हो गरीब हूँ मैं,
पर,ताकीद कर दू तुम्हे,
ए.सी. में रहने वाले,
और,चार पहिये गाड़ी से, चलने वालो की;
तक़दीर लिखी है मैंने,
बताओ,वोट के,
भिखमंगो को अपना सर्वस्व दे,
कैसे गरीब हुआ मैं ????????

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(चित्र गूगल से साभार )

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

क्या ऐसा भी हो सकता है भला कभी!!!!!!


जानते हो.....
कल रात सर में,
तेज दर्द हुआ था मुझे.
मालुम नहीं कहाँ से-
लेकिन हाँ,
वो आ बैठी थी मेरे सिरहाने!

ज्यादा तो नहीं...
पर इतना याद है मुझे,
वह तमाम रात,
अपने आसुओं से,
भिगो-भिगो सर पे रक्खी पट्टी,
बदलती रही.

शायद...
कुछ नाराज भी थी,
बोली..रोहित अपना ख्याल भी,
कर लिया करो कभी.
पकड़ हाथ उसका तब कहा मैंने उससे,
कैसे...अब तुम साथ भी तो नहीं होती मेरे?

वह...
मुस्कुराई थी तब,
झुका सर अपना मेरे पलकों को चुम,
कहा उसने-
पगले..ऐसा क्यों कहते हो तुम,
क्या ऐसा भी हो सकता है भला कभी!!!!!!

(चित्र-गूगल से साभार)

जब आप कल्पना की दुनिया को जीते हो..
और ऐसा कुछ हो जाता हो!
तो यथार्थ व्यर्थ हो जाता है...है न ?
...............रोहित!!!!!!


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आप मेरी इस रचना को यहाँ भी देख सकते हैं....

http://urvija.parikalpnaa.com/2011/02/blog-post_26.html

मंगलवार, 30 नवंबर 2010

जीवन!!!!!!!!


क्या है जीवन?


कभी रोता है बचपन,
तो हँसता है यौवन ,
और बेबस है उम्र का चौथेपन ..
हाँ इनके मूल मे है जीवन ,
यही है जीवन!!!


शैशव-काल का भोलापन ,
या यौवन के मद में चूर हो-
किया गया पागलपन ,
फिर अतीत को झुठलाने की खातिर-
बुढ़ापे में ओढा गया साधुत्व का आवरण...
हाँ इनके मूल मे है जीवन,
यही है जीवन!!!


सतत अविरल प्रवाह है जीवन,
कभी दुग्ध-सी श्वेत तो,
कभी अमावास-सी श्यामल है जीवन
तमाम दुराग्रहो से निर्लिप्त,
विविध रंगों से युक्त-
सतरंगी है जीवन .


हाँ प्रकृति के मूल में है जीवन,
यही है जीवन!!!
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इतने दिनों के बाद पोस्ट करते वक़्त कुछ कहते नही बन रहा है...सच है,
यहाँ से दूर रहना मेरे लिए काफी तकलीफदेह था.
उम्मीद है आगे से मैं आप लोगो से निरंतर जुडा रहूँगा...
आपके प्यार व आशीर्वाद का आकांछी ------ रोहित!!!!!!

(चित्र- गूगल से साभार)

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